Monday, January 24, 2011

"महत्वाकांक्षा"


एक पतंग 
उड़ रही है आसमान में 
ऊंचाइयों पर !


पतंग, जिसने पाल रखी हैं स्वयं की इच्छाएं, अभिलाषाएं, ज़रूरतें 
अपने मन में !
बंधी हुई है वह एक डोरी से,
डोरी जो चल रही है पतंग बाज के इशारे पर !


आज है उसके पास खुला आसमान 
उड़ने के लिए,
लोग लालायित हैं 
उसके जैसी ऊँचाई पाने के लिए 
पर वह है कि संतुष्ट नहीं 
अपने आज से, 
अपने जीवन से !


वह चाहती है उड़ना 
उन्मुक्त गगन में,
आज़ाद पंछी की तरह !


न कर पाई वह ऐसा 
चलती रही पतंग बाज के इशारे पर 
सोचती रही, 
काश ! कोई कर दे उसे अलग डोरी से
हो जाये वह आज़ाद !


हो गयी मुराद पूरी एक दिन 
कहीं से आई एक दूसरी पतंग 
उडती हुई 
बंधी डोरी से,
काट दिया उसने इस पतंग की डोरी को !


लेकिन हाय ! 
बिन डोरी कहाँ टिक पाई वह आसमान में 
गिरी ज़मीन पर 
और दब कर रह गयी 
उसकी इच्छाएं, अभिलाषाएं, जरूरतें 
और 
पंछी की तरह उन्मुक्त गगन में उड़ने की चाह !


जरूरी हैं स्वयं के पर भी 
मर्जी के आसमान में उड़ने के लिए !


मनोज 'मनु'