Tuesday, March 8, 2011

तुझे अपना कहा मैंने तुझे अपना कहूँगा भी !
मिलन में खुश हुआ था तब, जुदाई को सहूंगा भी !
कोई दुल्हन के कानो में जरा चुपके से ये कहदे ,
मैं उसका था मैं उसका हूँ मैं उसका ही रहूँगा भी !!
जो तुम मेरे नहीं थे तो भी अब तक जी लिया मैंने !
जहर तुमसे बिछड़ने का भी हंसकर पी लिया मैंने !
नहीं मुमकिन कोई तुमको मेरे दिल से अलग कर दे,
तेरी तस्वीर को रखकर कलेजा सी लिया मैंने !!

Wednesday, March 2, 2011

क्यूँ शिकवा,शिकायत,गिला किया मैंने !
ज़रा सी बात थी, तुझको रुला दिया मैंने !
मैं तेरी राह में पलकें बिछाए बैठा हूँ ,
तू समझता है कि तुझको भुला दिया मैंने !!

Wednesday, February 23, 2011

मेरी दुनिया ये सूनी है ज़रा तुम छम से आ जाओ !
प्रणय का मौन आमंत्रण न यूँ इठला के ठुकराओ !
इससे पहले जमाना कि गिराए बिजलियाँ हम पर,
छुपा लो मन में तुम मुझको या मेरे मन में आ जाओ 
लवों पर गीत है मेरा मुझ ही में खो रहे हो तुम !
छुपा है चाँद सा चेहरा कि शायद रो रहे हो तुम !
लगाकर पतियाँ मन से संजोये हो मेरी यादें ,
मैं कैसे मान लूं कि अब पराये हो रहे हो तुम !!
स्वरों के खोल दो बंधन जुबां को आज गाने दो !
जो सोये हैं बहुत दिन से मुझे अरमां जगाने दो !
अहं को तोड़ कर वो आज आयेंगे मुझे मिलने,
हटाओ पुष्प राहों से मुझे पलकें बिछाने दो !!  


हमने तुम्हारा निम्नतम स्तर परख लिया 
बातें न करो हमसे तुम ऊंची उड़ान की !


कुत्ते  के मुंह से छीन के रोटी जो खा गया 
शेखियां बघारता है अपनी शान की !

जब खो गया था मैं कुछ देर के लिए 
सबने उड़ाई धज्जियाँ माई के मान की !

इज्जत जो आज है ज़रा, लोगों की आँख में 
क्या सोचते हो तुमसे है इस खानदान की !

Monday, January 24, 2011

"महत्वाकांक्षा"


एक पतंग 
उड़ रही है आसमान में 
ऊंचाइयों पर !


पतंग, जिसने पाल रखी हैं स्वयं की इच्छाएं, अभिलाषाएं, ज़रूरतें 
अपने मन में !
बंधी हुई है वह एक डोरी से,
डोरी जो चल रही है पतंग बाज के इशारे पर !


आज है उसके पास खुला आसमान 
उड़ने के लिए,
लोग लालायित हैं 
उसके जैसी ऊँचाई पाने के लिए 
पर वह है कि संतुष्ट नहीं 
अपने आज से, 
अपने जीवन से !


वह चाहती है उड़ना 
उन्मुक्त गगन में,
आज़ाद पंछी की तरह !


न कर पाई वह ऐसा 
चलती रही पतंग बाज के इशारे पर 
सोचती रही, 
काश ! कोई कर दे उसे अलग डोरी से
हो जाये वह आज़ाद !


हो गयी मुराद पूरी एक दिन 
कहीं से आई एक दूसरी पतंग 
उडती हुई 
बंधी डोरी से,
काट दिया उसने इस पतंग की डोरी को !


लेकिन हाय ! 
बिन डोरी कहाँ टिक पाई वह आसमान में 
गिरी ज़मीन पर 
और दब कर रह गयी 
उसकी इच्छाएं, अभिलाषाएं, जरूरतें 
और 
पंछी की तरह उन्मुक्त गगन में उड़ने की चाह !


जरूरी हैं स्वयं के पर भी 
मर्जी के आसमान में उड़ने के लिए !


मनोज 'मनु'