Tuesday, August 31, 2010



इन्हें ले जाओ घर अपने, मेरी गजलों  को अपना नाम दे दो 
दर्द-ए-दिल उतर आया ज़रा नीचे, मुझे दो वक्त का सामान दे दो  


ज़रा सी जिद पे जो इज्ज़त सरे बाज़ार आई है
उसे देहलीज और घूँघट में फिर सम्मान दे दो 


अहिंसा के पुजारी को करो बदनाम ऐसे कि 
बस्तियां तोड़कर गांधीनगर का नाम दे दो 


तनिक सी उम्र में सौ जन्म के गम पा लिए मैंने 
कई रातों का जागा हूँ माँ गोद में आराम दे दो    


मनोज 'मनु'

Saturday, August 28, 2010

"उसका वचन"


वो कहती थी
मैं निभाउंगी तुम्हारा साथ,
जिन्दगी भर !


वो करती भी रही,
उसने जो कहा
आखिर परम्परा जो निभानी थी उसे 
अपने कुल की,
वचन न तोड़ने की !


वचन !  
जो दिया था उसने तव,
जब जिंदगी थी मखमली !


वो निभाए जा रही थी उसे आज भी,
पथरीले रास्तों में भी,
पीड़ा के अतितीब्रतम पलों में भी !


वो रही मेरे साथ तव भी,
जब कि सारी भीड़ छट चुकी थी
अपने से दिखने वाले पराये लोगों की !


रह गए थे मेरे साथ चंद लोग मेरे अपने
और वो,
जो परायी होकर भी बन गयी थे अपनों से ज्यादा !


पर न छट पाए पीड़ा के बादल ! 
एक दिन 
फिर से एक आंधी और,
मेरे जीवन में !


और हो गया उसे भी एहसास कि-
कितना मुश्किल है पीडाओं के साथ जीना !


उसने भी कर लिया फैसला
वचन तोड़कर 
जीवन भर साथ रहने का !
खुशियों के साथ !


मनोज "मनु"   
"औरत" 


मैं नहीं लिखना चाहता 
माँ की बेबसी पर,
बहन को दी गयी यातनाओं पर,
मैं नहीं लिखूंगा,
बेटी के आंसुओं की कहानी भी !


आखिर क्यूँ नहीं सीखती
खुद औरत !


सदियों के बाद भी !
ठोकरें खाकर संभलना,
फिर चलना, जीना !


जबकि उसी ने मुझे सिखाया है 
डटे रहना आँधियों में भी,
तुफानो से घिरने पर भी,
होंसला रखना !
नहीं डरना ! 
हालात से लड़ना !


मनोज "मनु"
"भ्रम"

वो नन्हा बीज,
ज़रूरत थी उसे ज़मीन की,
चाहिए थी खाद भी,
पानी और धूप भी !

दे दी उसे ज़मीन,
अपने हिस्से की
जड़ें फ़ैलाने के लिए !

देता रहा अपने अनुभवों की 
खाद भी !

बचाता रहा तेज हवाओं से,
अपनी ओट में लेकर !

सींचता रहा अपने हिस्से का जल,
कभी सूरज कि तपन भी,
जितनी जरुरी थी !

वट-ब्रक्ष बनना दूर है अभी कि,
हो गया उसको भ्रम,
मुझसे बड़ा होने का !

मनोज "मनु"   

Saturday, August 21, 2010

'दुःख'




चिंतन 
उन पलों का 
जो गुजारे थे एक साथ !

थोडी सी चिंता 
उसके लिए 
कहीं वो चिंतित न हो !

और जमती गयीं
कुछ परतें हृदय में
मोह की !

फिर प्रस्फुटित हुई एक चाह
उसे समेट लेने की
स्वयं मे !

कोशिशें नाकाम !

चिंतन हुआ कम,
बडती गयी चिंता
हृदय में !

मोह के साथ साथ  
वह घुल गयी रक्त मे, 
और उसने चुरा ली उसी की कुछ बून्दें
हृदय से !

फिर चिंता उतर आई आंखो मे 
लेकर वही बून्दें रक्त की
खारे पानी की रूप में !

और जन्म ले चुका था 
एक शिशु
जिसका नाम है 'दुःख' !

मनोज 'मनु' 
"दिखाने के लिए" 


मुस्कुराओ 
दिखाने के लिए
बस एक बार !

चाहे न हो तन पर कपडा,
भिंच गयी हो अंतड़ियाँ,
भूख से चाहे !

ईटों के बोझ तले,
दब गया हो 
बचपन चाहे ! 

रख लो एक पत्थर और,
मन पर,
लेकिन मुस्कुराओ 
बस एक बार 
दिखाने के लिए ! 

चाहे न कर पाई हों 
तुम्हारी उँगलियाँ स्पर्श कलम को,
न देखा हो भले स्कूल,
तुम्हारी आँखों ने, 
शापित हो गया हो तुम्हारा जीवन,
निरक्षरता से चाहे ! 

लेकिन मुस्कुराओ 
बस एक बार 
दिखाने के लिए !

हमें तो खींचनी है बस एक तस्वीर,
"बाल शोषण का अंत"
 और 
"साक्षरता" 
दिखाने के लिए !

मनोज'मनु' 
"आरक्षण" 


तुम भूखे थे 
दया आ गयी हमें तुम पर 
दे दिया अपने हिस्से का भोजन 
कुछ समय के लिए !


अब जबकि हो गए हो सक्षम इतने कि-
कर सको
दो वक्त का इंतजाम
स्वयं, 
जी सको इज्जत से !


पेट भरा है तुम्हारा 
आज !


तुम्हारी नजर 
हमारी ही थाली पर है 
आज भी !


आरक्षण कि नहीं 
ज़रूरत है तुम्हे 


स्वाभिमान की ! 


मनोज 'मनु' 

"मेरा घर" 


गर्मियों में ज्यादा गर्म, 
सर्दियों में ज्यादा सर्द, 
बारिश में तर-बतर .......मेरा घर 

मिट्टी की दीवारें,
कवेलू, टीन का छप्पर,
पर महलों से बढकर ......मेरा घर 

अभावों का बचपन,
संघर्षमय यौवन,
फिर भी हमसफ़र ........मेरा घर 

माँ से जगमगाता,
बहनों से चह-चहाता,
पिता से कांपता थर-थर.........मेरा घर 


मनोज 'मनु'