इन्हें ले जाओ घर अपने, मेरी गजलों को अपना नाम दे दो
दर्द-ए-दिल उतर आया ज़रा नीचे, मुझे दो वक्त का सामान दे दो
ज़रा सी जिद पे जो इज्ज़त सरे बाज़ार आई है
उसे देहलीज और घूँघट में फिर सम्मान दे दो
अहिंसा के पुजारी को करो बदनाम ऐसे कि
बस्तियां तोड़कर गांधीनगर का नाम दे दो
तनिक सी उम्र में सौ जन्म के गम पा लिए मैंने
कई रातों का जागा हूँ माँ गोद में आराम दे दो
मनोज 'मनु'